Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
अयं नाहमिति ज्ञाते स्फुटे सोदेति भावना ।
मिथ्याहंकारता तस्माद्यया नूनं विरज्यते ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवांश में भी वह त्वंपदार्थ के शोधनरूप से पर्यवसित होती है, इस आशय से जीवांश में उसी को
स्फुटतया कहते हैं।
देह आदि कार्य-कारणसंघात मैं नहीं हूँ 'इस प्रकार जब भीतर विचार उत्पन्न हो जाता है, तब
ब्रह्मभावना उत्पन्न होती है, इसी से अहंभाव में मिथ्यात्व सिद्ध हो जाता है और उससे पुरुष विरक्त
होता हे