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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मैवाहमिति ज्ञाने सत्ये सोदेति भावना । तस्मिन्सत्ये निजे रूपे यथान्तः परिलीयते ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

पदार्थ शोधक फलभूत अखण्ड वाक्यार्थवबोधस्वरूप से भी उसका पर्यवसान होता है, इस आशय से उसमें जीव और जगद्रूपत्व के बाधस्वरूप लय का स्पष्टीकरण करते है । मैं एकमात्र ब्रह्मस्वरूप हूँ, इस प्रकार सत्स्वरूप ज्ञान होने पर ब्रह्मभावना उदित होती है; उस सत्य निजरूपका परिज्ञान होने पर जीव-जगद्धाव लीन हो जाता है । अखण्डाकार ब्रह्म का अवबोध होने पर स्थित भी जगत सदेकरस ब्रह्मस्वरूप ही है, पहले की नाई दुःखस्वरूप नहीं हे, (इस आशय से कहते है) उस अखण्ड वाक्यार्थ के अपरिच्छिन्न स्वभाव से आविर्भूत हो जाने पर यह सब एकमात्र ब्रह्मस्वरूप ही हे । ऐसा जानता हू