Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
तत्त्वावकाशकं स्वच्छं चिद्ब्रह्मास्मि न मे क्षयः ।
अनारतगलत्स्वच्छचिद्धारागहनात्मकम् ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त वृत्तियों मे अनुगत तत्व का उपपादन कर रहे महाराज वस्िष्ठजी उक्त अर्थ को ही
विस्पष्टरूप से कहते हैं।
अग्नि से निकलनेवाले विस्फुलिंगों की (चिनगारियों की) धाराओं की नाईं वृत्तिरूप उपाधिधाराओं
से निरन्तर निकल रही चित्-धाराओं की उत्पत्ति स्थानीय प्रत्यगात्मा के स्वरूपभूत, प्रकाशात्मक,
योगियों के द्वारा अनुभूयमान होने पर भी निर्वचन करने के लिए असमर्थ तथा परम अमृतमय यानी
सर्वातिशायी आनन्दरूप चैतन्य ब्रह्म मैं ही हूँ