Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 76
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 76
संस्कृत श्लोक
या खस्था ननु चिच्छक्तिस्तच्चिद्ब्रह्मास्ति निर्मलम् ।
सुखदुःखादिकलनाविकलो निर्मलस्तथा ॥ ७६ ॥
हिन्दी अर्थ
उदासीन पुरुषों को सुख, दुःख आदि आकारवाली अन्य वृत्तियों के अभाव काल में निर्विशेष
स्वात्मप्रकाश (स्वात्मज्ञान) प्रसिद्ध ही है, इस आशय से कहते हैं।
मैं सुख, दुःख आदि कल्पनाओं से रहित एवं निर्मल हूँ तथा सुख-दुःखाकार वृत्ति के अभाव-दशा
में उदासीन पुरुषों को प्रतीत होनेवाला सत्य अनुभवरूप जो चैतन्य ब्रह्मस्वरूप है, वही अविनाशी मैं
हूँ