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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verses 87–88

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verses 87–88 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 87

संस्कृत श्लोक

छेदे भेदे स्फुरद्रूपं चिद्ब्रह्माहमनामयम् । आक्रान्तभुवनाप्यभ्रमालेव स्पन्दशालिनी ।। ८७ दुर्लक्ष्याणुमयाकारा चिच्छक्तिरहमातता । अनुभूतिमयान्तस्था स्नेहमात्रोपलक्षिता ।। ८८

हिन्दी अर्थ

समस्त जल को आक्रान्त करनेवाली वायु की गति से गतिशील और छोटे-छोटे जलकणों से रूप (अपना कल्पित आकार) ग्रहण करनेवाली विस्तृत मेघमाला के सदृश समस्त लोकों को आक्रान्त करनेवाली, वृत्तिरूप उपाधि के स्पन्दन से स्पन्दमान एवं सूक्ष्म जीवात्मक कल्पित आकारवाली जो विस्तृत चित्‌शक्ति हे, वही मैं हू