Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 89
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 89 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 89
संस्कृत श्लोक
क्षीराद्धृतस्य सत्तेव चिदहं क्षयवर्जिता ।
कटकाङ्गदकेयूररचना तदतन्मयी ।। ८९
हिन्दी अर्थ
जिसका सार अनुभवमात्र से गम्य है,
जो स्नेह से (चिकनाहट ओर उत्कट प्रेम से) उपलक्षित है तथा जो दूध में घी की सत्ता की नाई
क्षयरहित चित्-सत्ता हे, वही मैं हूँ ॥ ८ ८॥ जैसे ककण, बाजूबन्द एवं केयूर की रचना सुवर्ण में सुवर्णसत्ता
की तरह ही स्थित हे, वैसे ही इस देह में सर्वत्र व्यापक चिवुब्रह्मात्मा की जो सत्ता स्थित हे, वही मैं
हूँ