Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 95
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 95
संस्कृत श्लोक
जाग्रत्यपि सुषुप्तस्थं चिदात्मानमुपास्महे ।
उष्णमग्नौ हिमे शीतं मृष्टमन्ने शितं क्षुरे ।। ९५
हिन्दी अर्थ
अग्नि आदि में उष्णता आदि के सत्तास्वरूर्पो का चित् से ही स्फुरण होने के कारण परमार्थतः
उष्णता आदि भी चित्स्वरूप ही हैं, इस आशय से कहते है।
अग्निमें उष्णतारूप, हिम में शीतता रूप, अन्न में माधुर्यरूप, छेदन हेतु तीक्ष्ण छुरे में तीक्षणतारूप,
अन्धकार में कृष्णतारूप ओर चन्द्र मेँ श्वेततारूप चिदाकार आत्मा की हम अभेदरूप से उपासना करते
हैं