Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 11, Verse 94
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 11, verse 94 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
अनारतकचद्रूपं चिदात्मानमुपास्महे ।
घटे पटे तटे कूपे स्पन्दमानं सदा तनौ ।। ९४
हिन्दी अर्थ
घट, पट, तीर, कुआँ आदि में सद्रूप
से स्थित; जरायुज, अण्डज, स्वेदज एवं उद्धिज्ज-इन चतुर्विध शरीरो मे स्फुरणशील अथवा इन
चतुर्विध शरीरो की चेष्टाओं में निमित्तभूत तथा जाग्रत अवस्था में भी सुषुप्ति की नाई परमार्थतः
निर्विकल्पस्वरूप से स्थित चिदाकार आत्मा की हम अभेद रूप से उपासना करते हैं