Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, Verses 1–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 110, verses 1–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 1-3
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततः समुदिते सूर्ये वितमस्यम्बरे स्थिते ।
समुद्गकादिव जगन्मणौ तस्मिन्विनिर्गते ॥ १ ॥
विकसत्यरुणोपान्ते चक्षुषीवाम्बुजाकरे ।
आचारेष्विव लोकेषु प्रसृतेष्वर्करश्मिषु ॥ २ ॥
दंपती तौ समुत्थाय कृतसंध्याक्रमौ स्थितौ ।
पत्रासने मृदुस्निग्धे कान्तौ काञ्चनकन्दरे ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, रात बीत जाने पर पिटारी से निकले हुए जगत् के
प्रकाशक मणि के सदृश प्रसिद्ध सूर्य भगवान् का उदय हो जाने पर जब आकाश बिलकुल अन्धकार से
शून्य हो गया - साफ हो गया, जब मनुष्यों के लाल-लाल नेत्रों के सदूश कमलों का वन खिलने लगा
और सम्पूर्ण लोकों में फैले हुए आचारों की नाईं जब सूर्य की किरणें चारों ओर दूर तक फैल गई तब वे
दोनों स्त्री-पुरुष उठ गये । उठकर सन्ध्याक्रम का सम्पादन करके वे दोनों कांचन की गुफा में जाकर
कोमल, चिकने तथा मनोहर पत्तों के बनाये गये आसन पर बैठ गये
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ नौवाँ सर्ग समाप्त एक सौ दसवाँ सर्ग संकल्प की सेना और हाथी के साथ वे दोनों अपने नगर में आ गये तथा चिरकाल तक राज्य करने के बाद वे दोनों विदेहमुक्ति को प्राप्त हो गये, यह वर्णन ।