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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, Verses 4–8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 110, verses 4–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 4-8

संस्कृत श्लोक

अथोत्थायात्र चूडाला रत्नकुम्भं पुरःस्थितम् । कान्ता संकल्पयामास पूर्णं सप्ताब्धिवारिभिः ॥ ४ ॥ तेन मङ्गलकुम्भेन तं पूर्वाभिमुखं स्थितम् । भार्या भर्तारमेकान्ते स्वराज्येऽभिषिषेच सा ॥ ५ ॥ संकल्पोपगते हैमे स्वभिषिक्तं स्वविष्टरे । स्थितं प्रोवाच तन्वी सा चूडाला देवरूपिणी ॥ ६ ॥ केवल मौनमुत्सृज्य तेजः शान्तमिदं प्रभो । अष्टानां लोकपालानां तेजस्त्वं भर्तुमर्हसि ॥ ७ ॥ चूडालयेति संप्रोक्तो वने राजा शिखिध्वजः । वदन्नेवं करोमीति महाराजत्वमाययौ ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

चूडाला द्वारा वन में यों कहने पर ठीक है, ऐसा ही करता हूँ - इस तरह बोल रहे राजा शिखिध्वज ने महाराज के स्वरूप को धारण कर लिया