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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, Verses 18–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 110, verses 18–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 18-21

संस्कृत श्लोक

तस्मान्महेन्द्रशैलेन्द्राच्चलितः स महीपतिः । पथि पश्यन्गिरीन्देशान्नदीर्ग्रामान्सजङ्गलान् ॥ १८ ॥ दर्शयन्स्वप्रियायास्तमात्मवृत्तान्तसंचयम् । प्रागल्पेनैव कालेन स्वां पुरीं स्वर्गशोभनाम् ॥ १९ ॥ तत्र ते तस्य सामन्तास्तदागमनमादृताः । विविदुर्जयशब्देन निर्जग्मुश्चोदिताशयाः ॥ २० ॥ एकतां संप्रयातेन तारतूर्यनिनादिना । बलद्वयेन तेनासौ विवेश नगरं नृपः ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

उस महेन्द्र पर्वत से राजा शिखिध्वज चल पडा रास्ते में पर्वतो, अनेक देशों, नदियों ओर जंगलों के साथ-साथ अनेक गाँवों को देख रहे तथा राज्यपरित्याग कर अपने नगर से बाहर निकलने पर तत्‌- तत्‌ देशवासियों के साथ जो-जो घटनाएँ जहाँ पर अपने ऊपर घटी थीं उन्हें अपनी प्रिया को दिखला रहे राजा शिखिध्वज ने थोड़े ही समय में स्वर्ग-सी सुन्दरी अपनी नगरी में प्रवेश किया | वहाँ उसके संमानित उन सामन्तो (सरदारों ) ने जय शब्द से उसके आगमन को जाना ओर जानते ही वे उत्कण्ठितचित्त होकर उसकी अगवानी के लिए नगर से शीघ्र बाहर निकल आये । नगाड़े आदि की उन्नत ध्वनि से युक्त तथा एक दूसरे में मिल गई उन दोनों सेना ओं के साथ वह राजा शिखिध्वज अपने नगर में प्रविष्ट हुआ