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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, Verses 22–29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 110, verses 22–29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 22-29

संस्कृत श्लोक

लाजपुष्पाञ्जलिव्रातैरावृष्टः पौरयोषिताम् । वणिङ्मार्गमसौ पश्यन्परंपरमनुत्तमम् ॥ २२ ॥ पताकाध्वजसंबाधं मुक्ताजालमनोरमम् । नृत्यगेयपरस्त्रीकं स्वभूमावचलं स्थितम् ॥ २३ ॥ प्रविश्याथ गृहं तैस्तैः संयुतं नृपमङ्गलैः । सम्यक्संमानयामास प्रणतं प्रकृतिव्रजम् ॥ २४ ॥ पुरोत्सवं भृशं कृत्वा दिनसप्तकमुत्तमम् । अकरोद्राजकार्याणि स्वानि स्वान्तःपुरे नृपः ॥ २५ ॥ दशवर्षसहस्राणि राज्यं कृत्वा महीतले । सहचूडालया राम विरतो देहधारणात् ॥ २६ ॥ देहमुत्सृज्य निर्वाणमस्नेह इव दीपकः । अपुनर्जन्मने राम जगामेति महामतिः ॥ २७ ॥ दशवर्षसहस्राणि समदृष्टितया तया । राज्यं तयाऽऽरमय्यापि निर्वाणं पदमाप्तवान् ॥ २८ ॥ विगतभयविषादो मानमात्सर्यमुक्तः प्रकृतसहजकर्मा भुक्तनीरागबुद्धिः । इति समसमदृष्टिर्मृत्युमार्योऽथ जित्वा दशशिशिरसहस्राण्येकराज्यं चकार ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

नगर की स्त्रियों द्वारा जिसके ऊपर लाजांजलियों ओर पुष्पांजलियों से वृष्टि की गई थी, ऐसे उस राजा ने व्यापारियों के मार्ग को, जो उत्तरोत्तर अत्यन्त रमणीय था, देखते हुए अपने राजमहल में - जो छोटी-छोटी पताकाओं तथा ध्वजाओं से खूब सजाया गया था, मोतियों के तोरणं से मनोहर था, जहाँ पर सत्यौ नृत्य ओर गान कर रहीं थीं, जो अपने स्थान पर कैलास पर्वत की नाई उन्नत था - प्रवेश कर उसने लोक-शारत्र प्रसिद्ध दही, दूर्वा, अक्षत, शंख, वीणा, छत्र, चँवर आदि राजा के योग्य मांगलिक तत्‌-तत्‌ वस्तुओं से युक्त विनीत अपने अमात्य आदि प्रकृति समूह का भलीभाँति सम्मान किया | सात दिन तक नगर में खूब उत्तम उत्सव करके अपने अन्तःपुर में राजा ने अपने राजकार्यो का सम्पादन किया । हे श्रीरामजी, इस पृथिवीतल के ऊपर दस हजार वर्षो तक चूडाला के साथ राज्य करके वह राजा शिखिध्वज इस देहधारण से विरत हो गया हे श्रीरामचन्द्रजी, इस शरीर का त्याग कर फिर जन्म न लेने के लिए, तेलरहित दीपक की नाई, वह महामति राजा शिखिध्वज निर्वाण को (केवल्य मुक्ति को) प्राप्त हो गया उस तरह की समदृष्टि से दश हजार वर्षो तक राज्य करके तथा उस अपनी प्रिया चूडाला के साथ खूब रमण करके वह राजा निर्वाण को प्राप्त हो गया। हे श्रीरामजी, भय और विषाद से शून्य, मान ओर मात्सर्य से मुक्त तथा उपस्थित सहज कर्मो का सम्पादन करनेवाले, भोगो में वैराग्यबुद्धि रखकर सबमें समरूप ब्रह्मदृष्टि से युक्त होते हुए उस आर्य शिखिध्वज ने उपर्युक्त बोध के द्वारा कामस्वरूप मृत्यु को जीतकर दस हजार वर्षो तक जम्बूद्वीप में एकछत्र राज्य किया