Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 110, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 110, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
भुक्त्वा भोगाननेकान्भुवि सकलमहीपालचूडामणित्वे स्थित्वा वै दीर्घकालं परममृतपदं प्राप्तवान्सत्त्वशेषः ।
एवं रामागतं त्वं प्रकृतमनुसरन्कार्यजातं विशोकस्तिष्ठोत्तिष्ठ स्वयं वा प्रसभमनुभवन्भोगमोक्षादिलक्ष्मीः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
श्लोक के पूवर्धि से शिखिध्वज की स्थिति का अनुवाद करके उत्तरार्थ से उसी स्थिति का रामचन्द्र
के लिए कर्त्तव्यरूप से उपदेश करते है।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इस तरह सम्पूर्ण राजाओं के मस्तक के चूडामणिरूप से
स्थित होकर दीर्घकालतक इस भूतलपर नानाविध अनेक भोगों का उपभोग कर सन्मात्ररूप अवशिष्ट
वह राजा शिखिध्वज अजर परमपद में अवस्थित हो गया । हे श्रीरामचन्द्रजी, इसी तरह आप भी
प्रारब्ध प्राप्त प्रकृत कार्यो का अनुसरण करते हुए शोक-शून्य होकर समाधि में स्थित रहिये अथवा
स्वयं खूब भोग-मोक्षलक्ष्मी का अनुसरण करते हुए आप सभी व्यवहारों में स्थित रहिये । मेरे कहने का
तात्पर्य यह है कि आप की समाधि और व्युत्थान के फल में कोई भेद नहीं है