Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 112, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
किमुच्यते मुनिश्रेष्ठ मिथ्यापुरुषनामकम् ।
वस्त्ववस्तु कृतं जगद्वस्तुजातं वदाशु मे ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार प्रशसा से अभिमुख किये गये गुरुजी के प्रति “मा दुःखितो भव व्यर्थ त्वं मिथ्यापुरुषो
यथा“ इत्यादि से पहले सूचित हुए मिथ्यापुरुष का कुतूहल से श्रीरामजी आख्यान पूछते हैं।
हे मुनिश्रेष्ठ, मुञ्जसे शीघ्र कहिए कि कोन वस्तु मिथ्यापुरुष नाम की कही जाती है, जिसने कि वस्तु
को अवस्तु बना दिया ओर अवस्तुभूत समस्त जगत् को वस्तु बना डाला