Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 112, Verses 17–26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 112, verses 17–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 112 · श्लोक 17-26
संस्कृत श्लोक
स एकान्ते क्वचिज्जातः शून्ये तत्रैव तिष्ठति ।
केशोण्ड्रकमिव व्योम्नि मृगतृष्णेव वा मरौ ॥ १७ ॥
तस्मादन्यन्न तत्रास्ति यदस्ति च स एव तत् ।
यच्चान्यत्तत्तदाभासं न च पश्यति दुर्मतिः ॥ १८ ॥
संकल्पस्तस्य संजातस्तत्र वृद्धिमुपेयुषः ।
खस्याहं खमहं खं मे खं रक्षामीति निश्चलः ॥ १९ ॥
खं स्थापयित्वा रक्षामि वस्त्विष्टं स्वयमादरात् ।
इति संचिन्तयन्व्योमरक्षार्थं सोऽकरोद्गृहम् ॥ २० ॥
तस्य कोशे बबन्धास्थां रक्षितं खं मयेत्यसौ ।
गृहाकाशेन संतुष्टस्ततः स रघुनन्दन ॥ २१ ॥
अथ कालेन तत्तस्य गृहं नाशमुपाययौ ।
ऋत्वन्तरेणाब्द इव वातेनेव तरङ्गकः ॥ २२ ॥
हा गृहाकाश नष्टं त्वं हा क्व यातमसि क्षणात् ।
हा हा भग्नमसि स्वच्छमित्येवैतच्छुशोच सः ॥ २३ ॥
इति शोकशतं कृत्वा पुनस्तत्रैव दुर्मतिः ।
कूपं चक्रे खरक्षार्थं कूपाकाशपरोऽभवत् ॥ २४ ॥
ततो नाशं स कालेन नीतः कूपोऽपि तस्य वै ।
कूपाकाशे गते शोकनिमग्नोऽसौ ततोऽभवत् ॥ २५ ॥
कूपाकाशप्रलापान्ते कुम्भं शीघ्रमथाकरोत् ।
कुम्भाकाशपरो भूत्वा स्वयं निर्वृतिमाययौ ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
मनुष्यों की जहाँ दृष्टि नहीं जाती, ऐसे एकान्त स्थान में भी वह स्वरूपतः मिथ्या ही था, यह
कहते है ।
वह किसी एक निर्जन एकान्त प्रदेश में उत्पन्न हुआ था और उसी शून्य प्रदेश में रहता था ।
वह वास्तव में आकाश में केशोण्ड्क सदृश ओर मरुभूमि में मृगतृष्णाजल के सदृश मिथ्या ही था।
उस मिथ्यापुरुष को छोडकर उस स्थान में दूसरा कुछ है नहीं ओर जो कुछ भी वहाँ पर यदि प्रतीत
होता है, तो अकेला वही प्रतीत होता है । यदि वह किसी दूसरे को देखता है, तो वह भी उसीकी
भ्रान्ति से ही देखता है, यह सब होते हुए भी वह “मे ही यहाँ सब कुछ हूँ यों नहीं देखता, क्योकि
वह दुर्मति है । वहाँ वृद्धि को प्राप्त हुए उस मिथ्यापुरुष को मन में एक संकल्प हुआ, वह यह कि
इस आकाश का मैं ही कारण हूँ और आकाश मेरा कार्य है, अतः आकाशरूप मैं ही निश्चल होकर
उसको व्याप्तकर उसकी रक्षा करता हूँ । मेरी प्रिय से प्रिय वस्तु आकाश है, अतः उसे कहीं पर
रखकर स्वयं मैं ही उसकी बड़े आदर से रक्षा करूँ, इस तरह विचारकर आकाश की रक्षा के लिए
उसने एक घर का निर्माण किया हे रघुनन्दन, तदनन्तर उस घर के अन्दर उसने यह आस्था बाँध
ली कि यह आकाश मेरा है और इसकी मैंने रक्षा की है और गृहाकाश से वह सन्तुष्ट हो गया ।
अनन्तर कुछ काल के बाद उसका वह घर उस प्रकार नष्ट हो गया, जिस प्रकार दूसरी ऋतु से यानी
शरत् ऋतु से मेघ या वायु से छोटे-छोटे तरंग नष्ट हो जाते हैं जब वह नष्ट हो गया तब
मिथ्यापुरुष इस प्रकार शोक करने लगा, हा गृहाकाश, तुम नष्ट हो गये, अरे तुम एक ही क्षण में
कहाँ चले गये, हा हा, तुम टूट गये, तुम बड़े अच्छे रहे । इस प्रकार सैकड़ों बार शोक कर फिर उस
दुर्बुद्धि मिथ्यापुरुष ने वहाँ पर आकाश की रक्षा करने के लिए एक कूप का निर्माण किया ओर उसी
कूपाकाश में पहले के-जैसी आस्था बोधकर रहने लगा । अनन्तर कुछ समय के बाद उसका वह कूप
भी नाश को प्राप्त हो गया यानी मिट्टी आदि से ढह गया । जब कूपाकाश नष्ट हो गया, तब वह उससे
महान् शोकसागर में निमग्न हो गया । कूपाकाश के लिए शोक कर चुकने के अनन्तर उसने तत्काल
ही एक घड़े का निर्माण किया ओर घटाकाश की रक्षा में तत्पर होकर स्वयं उसके अभिमान -सुख
को प्राप्त हुआ