Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 114, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 114, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 114 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

पुष्पकोश इवामोदो महोर्मिरिव सागरे । रश्मिजालमिवादित्ये मनो ब्रह्मणि राघव ॥ २ ॥ तस्यादृश्यात्मतत्त्वस्य विस्मृत्यैव गतं स्थितिम् । नान्यस्मादागतं राम जगद्रज्जुभुजङ्गवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

अभिन्नसत्ता से पख्रह्म में हुई उसकी स्थिति में दरष्टान्त बतलाते है । हे राघव, फूलों मे जसे सुगन्ध, सागर में जैसे बड़े-बड़े तरंग और सूर्य में जैसे किरणें अभिन्न सत्ता से रहती हैं, वैसे ही ब्रह्म मे मन भी अभिन्न सत्ता से रहता हे । हे श्रीरामजी, इन्द्रियो से अगम्य उस आत्मतत्व के एकमात्र अज्ञान से ही मन ने उसमें समस्त जगत्‌ के कारणरूप से स्थिति प्राप्त की हे । इसलिए यह जगत्‌ रज्जुसर्पं के सदुश कहीं किसी दूसरे कारण से प्राप्त नहीं हुआ हे