Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 115, Verses 11–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 115, verses 11–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 115 · श्लोक 11-20
संस्कृत श्लोक
ईश्वर उवाच ।
धर्माधर्मौ महाभाग शङ्काविरहिताक्षयः ।
यः करोति यथाप्राप्तौ महाकर्ता स उच्यते ॥ ११ ॥
रागद्वेषौ सुखं दुःखं धर्माधर्मौ फलाफले ।
यः करोत्यनपेक्षेण महाकर्ता स उच्यते ॥ १२ ॥
मौनवान्निरहंभावो निर्मलो मुक्तमत्सरः ।
यः करोति गतोद्वेगं महाकर्ता स उच्यते ॥ १३ ॥
शुभाशुभेषु कार्येषु धर्माधर्मैः कुशङ्कया ।
मतिर्न लिप्यते यस्य महाकर्ता स उच्यते ॥ १४ ॥
सर्वत्र विगतस्नेहो यः साक्षिवदवस्थितः ।
निरिच्छं वर्तते कार्ये महाकर्ता स उच्यते ॥ १५ ॥
उद्वेगानन्दरहितः समया स्वच्छया धिया ।
न शोचते यो नोदेति महाकर्ता स उच्यते ॥ १६ ॥
यथार्थकाले मतिमानसंसक्तमना मुनिः ।
कार्यानुरूपवृत्तस्थो महाकर्ता स उच्यते ॥ १७ ॥
उदासीनः कर्तृतां च कर्माकर्माचरंश्च यः ।
समं यात्यन्तरत्यन्तं महाकर्ता स उच्यते ॥ १८ ॥
स्वभावेनैव यः शान्तः समतां न जहाति वै ।
शुभाशुभं ह्याचरन्यो महाकर्ता स उच्यते ॥ १९ ॥
जन्मस्थितिविनाशेषु सोदयास्तमयेषु च ।
सममेव मनो यस्य महाकर्ता स उच्यते ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
(समस्त शंकाओं का पिण्ड छोडकर, यह जो अंश कहा गया है, उसीकी विशद व्याख्या करते है ।
हे महाभाग, आत्मा न तो कर्ता है और न भोक्ता ही है, इस प्रकार के निश्चय से कर्तृत्व आदि
शंकाओं से रहित मनवाला होकर समयानुसार प्राप्त धर्म ओर अधर्म का जो पुरुष अनुष्ठान करता
है, वह महाकर्ता कहा जाता है । जो पुरुष रागद्वेष पेदा करनेवाली चेष्टा ओर सुखदुःख की प्रयोजक
धर्म-अधर्मरूप क्रियाका-फलाफल की इच्छा से रहित मन से-एकमात्र लोकसंग्रहार्थं आचरण करता
है, वह महाकर्ता कहा जाता है । अहम्भाव से शून्य, निर्मल और मात्सर्यनिर्मुक्त जो पुरुष उद्वेग को
छोडकर मुनि की क्रियाओं से युक्त होकर मनन आदि क्रियाओं का अनुष्ठान करता हे, वह महाकर्ता
कहा जाता हे । प्रारब्ध से अनुष्ठित हुए अश्वमेध आदि सत्कर्म ओर कलंजभक्षण आदि असत्कर्मो की
दशा में भें धार्मिक हूँ, मैं अधार्मिक हू, इत्यादि कुशंका से कल्पित धर्म ओर अधर्म के द्वारा जिसकी
बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह महाकर्ता कहा जाता है । जो कहीं पर भी स्नेह नहीं रखता, जो साक्षी के
सदृश निर्विकार रहता है, ओर जो प्राप्त कार्य का निरीह (निर्वासनिक) होकर बर्ताव करता है, वह
पुरुष महाकर्ता कहा जाता है । उद्वेग ओर आनन्द से रहित जो पुरुष निर्मल समबुद्धि से शोकजनक
परिस्थितियों में शोक नहीं करता और हर्षजनक परिस्थितियों में हर्ष नहीं करता, वह महाकर्ता कहा
जाता हे । अपने प्रारब्ध से जिस समय में जो भी कोई उचित कार्य प्राप्त हो जाय, उस समय में उस
कार्य के लिए चेष्टा करने में तत्पर रहनेवाला, आसक्तिशून्य जो बुद्धिमान् मुनि है, वह महाकर्ता कहा
जाता है । उदासीन होकर विहित ओर निषिद्ध कर्मो का स्वयं आचरण या दूसरों को आचरण कराने
के लिए प्रेरणा कर रहा जो पुरुष-मन में आत्मा के अकर्तृत्वनिश्चय से-दोनों जगह समभाव से युक्त
रहता हे, वह महाकर्ता कहा जाता हे । जो स्वभाव से ही शान्त है, जो मित्र ओर शत्रुओं में शुभाशुभ
का आचरण करने पर भी समता नहीं छोडता, वह महाकर्ता कहा जाता है । जन्म, स्थिति, विनाश
आदि भावविकारों में तथा वृद्धि एवं हास से युक्त शरीरो में आत्मबुद्धि के कारण जिसका मन एकरूप
ही रहता है, वह महाकर्ता कहा जाता हे