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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verses 1–2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 116, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ चित्तेऽहंकारनामनि । गलिते वा गलद्रूपे लिङ्गं सत्त्वस्य किं भवेत् ॥ १ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । बलादपि हि संजाता न लिम्पन्त्याशयं सितम् । लोभमोहादयो दोषाः पयांसीव सरोरुहम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे सर्वधर्मज्ञ, हे भगवन्‌, अहंकार नामक चित्त जिस समय गलित हो जाता है या गलने लग जाता है उस समय हुए वासनाशून्य मन का क्या स्वरूप होता हे २।१॥ यों श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा पूछे जाने पर, मोह आदि दोषों का क्षय ही पहले मुख्य स्वरूप है, ऐसा महाराज वस्चिष्ठजी कहते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, शुभ्र (वासनाशून्य) मन को परीक्षा करने के लिए दूसरों के द्वारा जवर्दस्ती पैदा कराये गये भी - लोभ, मोह आदि दोष उस तरह लिप्त नहीं कर सकते, जिस तरह जल कमल को लिप्त नहीं कर सकते

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सोलहवाँ सर्ग गल रहे तथा गलित हुए चित्त के लक्षणों का वर्णन ।