Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 116, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
मुदिताद्याः श्रियो वक्रं न मुञ्चन्ति कदाचन ।
गलत्यहंकारमये चित्ते गलति दुष्कृते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
सदा मुख की प्रसन्नता भी उसका लक्षण है, यह कहते हैं।
हे श्रीरामजी, ज्ञानाग्नि से विवादहेतु पापरूप अहंकारनामक चित्त के विलीन हो जाने पर प्रसन्नता
आदि शोभाएँ मुख को नहीं छोड़ती