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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 116, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

बुद्ध्यालोकेन साध्येऽस्मिन्वस्तुन्यस्तमितापदि । प्रवर्तते न यो मोहात्तं धिगस्तु नराधमम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

अब आत्मलाभ की अत्यन्त सुलभता दर्शा रहे महाराज वस्निष्ठजी उसके लिए प्रवृत्त न हुए पुरुषों की निन्‍्दा करते हैं। बुद्धिरूपी प्रकाश से लभ्य इस परमात्मवस्तु में, जिसका लाभ होने पर समस्त आपत्तियाँ अस्त हो जाती हैं, जो मनुष्य मोह के कारण प्रवृत्त नहीं होता, उस नराधम को धिक्कार है