Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 116, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
विश्रान्तिमाप्तुमुचितां चिरमंग दुःखरत्नाकरं जननसागरमुत्तितीर्षोः ।
कोऽहं कथं जगदिदं च परं च किं स्यात्किं भोगकैरिति मतिः परमोऽभ्युपायः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तब उसकी प्रवृत्ति में कौन-सा प्रथम उपाय है, यदि ऐसी कोई आशंका करे, तो उस पर-विवेक
ओर वैराग्य ही उसकी प्रवृत्ति मे प्रथम उपाय है-यह कहते हैं ।
हे श्रीरामजी, दुःखरूपी रत्नों का भंडार, जन्म ओर मरण से युक्त संसारसागर को पार करने की
इच्छा रख रहे पुरुष के लिए निरतिशयानन्द आत्मा में चिरकाल तक समुचित विश्रान्ति पाने में “मे कोन
हू "यह जगत् क्या है, परमात्मतत्त्व कैसा है ? इन तुच्छ भोगों से कोन -सा फल मिलेगा" यों निरन्तर
खूब अभ्यस्त हुई विचार और वैराम्यरूपिणी मति ही परम उपाय अभिमत है, इसलिए उसीका आश्रय
करना चाहिए, यह भाव हे