Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 117, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भवतामादिपुरुष इक्ष्वाकुर्नाम भूपतिः ।
इक्ष्वाकुवंशप्रभव यथा मुक्तस्तथा श्रृणु ॥ १ ॥
इक्ष्वाकुर्नाम भूपालः स्वराज्यं परिपालयन् ।
कदाचिदेकान्तगतो मनसा समचिन्तयत् ॥ २ ॥
जरामरणसंक्षोभसुखदुःखभ्रमस्थितेः ।
अस्य दृश्यप्रपञ्चस्य को हेतुः स्यादिति स्वयम् ॥ ३ ॥
जगतो न विवेदासौ कारणं चिन्तयन्नपि ।
अथैकदा पृच्छदसौ ब्रह्मलोकागतं मनुम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
का हेतु क्या है ? विचार कर रहे भी वह राजा जब जगत् के कारण को न समझ सके तब उन्होने एक दिन
ब्रह्मलोक से आये हुए सभा में बैठे तथा पूजित हुए अपने पिता प्रजापति मनु से पूछा