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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 116, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

सुखदुःखादयस्त्वेते दृश्यन्ते यदि वा मुखे । दृश्यन्त एव तुच्छत्वान्नानुलिम्पन्ति ते मनः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानियों के मुख पर भी युख-दुःख के चिह्न प्रसाद और मालिन्य आदि किसी समय दिखाई देते हैं जैसे कि दुर्वासा ऋषि का शाप सुनने पर कुम्भ तथा राजा शिखिध्वज के मुख पर अथवा विश्वामित्र के द्वारा हरिश्चन्द्र को ठगने पर तथा पुत्र को मारने पर वस्रिष्ठजी के मुख पर उदासी साफ झलक रही थी, ऐसी दशा में प्रसन्नता आदि शोभाएँ मुँह को नहीं छोड़ती” यह आपका लक्षण कैसे घटता है ? यदि ऐसी आशंका की जाय, तो उस पर कहते हैं। ये सुख, दुःख आदि यदि दिखाई देते भी हैं, तो फिर वे दिखाईमात्र ही देते हैं, क्योकि ऐसे पुरुष की दृष्टि में तुच्छ होने के कारण उसके मन को वे लिप्त नहीं कर पाते हैं । भोग करानेवाले प्रबल प्रारब्ध से दुःख और दुःख के चिह मालिन्य की आभा का कभी उदय होने पर भी अगले क्षण में ही मिथ्यात्वबुद्धि से उनके बाधित हो जाने पर ज्ञानी पुरुष के चित्त को वे लिप्त नहीं कर पाते, इसलिए ज्ञानियों के मुख पर जो स्वाभाविक प्रसन्नता रहती है, उसका विघात नहीं होता, यह तात्पर्य हे