Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 116, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 116, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
चित्ते गलति गीर्वाणगणस्य स्पृहणीयताम् ।
साधुर्गच्छत्युदेत्यस्य समता शीतचन्द्रिका ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त गल जाने पर साधु पुरुष देवताओं का भी स्पृहणीय बन जाता है। इस पुरुष के हृदय
में शीतल चांदनीरूपी समता उदित होती है