Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 117, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
यथा गन्धर्वनगरं यथा वारि मरुस्थले ।
यत्तु नो दृश्यते किंचित्तन्न किंचिदिव स्थितम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
अपने उपादान कारण में परमसूक्ष्मरूप से स्थित कार्य ही अपने कारणों के द्वारा आविर्भूत होता
है - ऐसा साख्यवादी लोग कहते हैं और वेदान्ती लोग कहते हैं कि सवुत्रह्म ही जगद्वूप से सृष्टि में
सम्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में यह कैसे कहते हैं कि जगत् कुछ भी नहीं है ? इन दोनों में साख्यवादी
के प्रति कहते हैं।
साक्षी या इन्द्रियों के द्वारा जो वस्तु दिखाई नहीं देती वह किसीभी रूप से, प्रमाण न होने के
कारण, अपने उपादान कारण में स्थित नहीं है। षष्ठ मननामक इन्द्रिय से अतीत होने के कारण उसकी
सम्भावना भी नहीं है