Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 117, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 117, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 117 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मनःषष्ठेन्द्रियातीतं यत्स्यादपि न किंचन ।
अविनाशं तदस्तीह तत्सदात्मेति कथ्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
वेदान्ती के प्रति कहते हैं।
हाँ, इस सृष्टि मे अविनाशी जो पर वस्तु है, वह तो स्थित है ही, वही 'सत्", "आत्मा" इत्यादि
नामों से कही जाती है