Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 118, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
यथा विमलतोयानां बहिरन्तश्च भावनम् ।
तेजस्तिष्ठति सर्वत्र तथात्मा सर्ववस्तुषु ॥ १० ॥
संनिवेशांशवैचित्र्यं यथा हेम्नोऽङ्गदादिता ।
आत्मनस्तदतद्रूपा तथैव जगदादिता ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
बाहर और भीतर असग चिति के प्रवेश से जड़ जगत् के स्फुरण में अनुरूप दृष्टान्त बतलाते हैं।
जैसे निर्मल जल के बाहर और भीतर सब जगह प्रकाशक तेज रहता है, वैसे ही सब वस्तुओं में
बाहर और भीतर सब जगह आत्मा रहता हैं। जैसे अंगद (केयूर) आदिरूप आभूषणों का आकार सुवर्ण
के ही अवयवों का एक वैचित्र्य है, वैसे जगत् तथा इसकी जड़ मायारूप आकार भी आत्मा की ही
कलाओं का एक वैचित्र्य हे