Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verses 12–14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 118, verses 12–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
विनाशवाडवाक्रान्तं भीमं काममहार्णवम् ।
जगज्जालतरङ्गिण्यो यान्ति भूततरङ्गिकाः ॥ १२ ॥
तथाप्यद्याप्यपूर्णस्य यः पाता कालवारिधेः ।
तमात्मानं महागस्त्यं राजन्भावय सर्वदा ॥ १३ ॥
अनात्मन्यात्मतामस्मिन्देहादौ दृश्यजालके ।
त्यक्त्वा सत्त्वमुपारूढो गूढस्तिष्ठ यथासुखम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
कालरूपी समुद्र के लिए आत्मा में अगस्त्य मुनि का आरोप करना अत्यन्त आवश्यक है, इसलिये
काल को ही जगद्भूपी नदियों का उपसहारस्थान (समुद्र) कहते हैँ ।
विनाशरूपी बडवाग्नि से आक्रान्त भयंकर कालरूपी सागर में प्राणिसमूहरूपी तरंगोंवाली
जगज्जालरूपी नदियाँ यद्यपि मिल जाती हैं । तथापि सम्पूर्ण जगज्जाल का भक्षक होने पर भी आज
तक जिसकी तृप्ति न हो सकी, ऐसे कालरूपी सागर का जो पानकर्ताहि, उस आत्मस्वरूपी महाअगस्त्य
की हे राजन्, आप सदा-भावना करते रहिये । अनात्मभूत इस देहादि दुश्यसमूह में आत्मता का त्यागकर
यानी इस देहादि दृश्यसमूह को आत्मा न समझकर निर्वासनिक भाव में उपारूढ हो करके गूढरूप से
सुखपूर्वक स्थित रहिये