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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 118, Verses 15–18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 118, verses 15–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 118 · श्लोक 15-18

संस्कृत श्लोक

कुचकोटरसंसुप्तं विस्मृत्य जननी सुतम् । यथा रोदिति पुत्रार्थं तथात्मार्थमयं जनः ॥ १५ ॥ अजरामरमात्मानमबुद्ध्वा परिरोदिति । हा हतोऽहमनाथोऽहं नष्टोऽस्मीति वपुर्व्यये ॥ १६ ॥ यथा वारि परिस्पन्दान्नानाकारं विलोक्यते । तथा संकल्पवशतश्चिद्ब्रह्म परिबृंहति ॥ १७ ॥ संस्थाप्य संकल्पकलङ्कमुक्तं चित्तं त्वमात्मन्युपशान्तकल्पः । स्पन्देऽप्यसंस्पन्दमिवेह तिष्ठ स्वस्थः सुखी राज्यमिदं प्रशाधि ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

नित्यस्वरूप आत्मा का लाभ होने पर भी उसकी अलब्धताकी भ्रान्ति से मनुष्य को शोक होता है, इसको कहते हैं। जैसे स्तनकोटर के ऊपर सोये हुए बच्चे को भूलकर उसकी माँ अपने बच्चे के लिए रोती है वैसे ही आत्मा के लिए यह मनुष्य रोता है। शरीर के नष्ट हो जाने पर यह प्राणी आत्मा को अजर और अमर न जानकर हा, मैं मर गया, मैं अनाथ हो गया, हा अब तो मैं बिलकुल नष्ट ही हो गया” यों विलाप करता है। जैसे परिस्पन्द के कारण एक ही जल नाना प्रकार के आकारों में दिखाई देता है वैसे ही संकल्पवश से यह चिद्रूप ब्रह्म ही नाना प्रकार के आकारों में कार्यपरम्परा से बढ़ता है । हे पुत्र, तुम संकल्परूपी कलंकों से निर्मुक्त चित्त को आत्मा में स्थापित करके फिर उपशान्त-से होते हुए (क्योकि उस समय समूल सम्पूर्ण संसार की उपशान्ति हो जाने पर भी प्रारब्ध भोगके उपयोगी उसके प्रतिभास का अवशेष रह जाता है) व्यवहार के लिए देहेन्द्रियादि का स्पन्दन होने पर भी उसकी आभासमात्रता होने से संस्पन्दशून्य ब्रह्म की नाई इस व्यवहारपूर्ण भूमि में स्वस्थ ओर सुखी होकर स्थित रहो और इस राज्य का परिपालन करते रहो