Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 119, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अभावनेन भावनं विलूय कर्मकाननम् ।
परं समेत्य तानवं विशोक एव तिष्ठ भोः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे राजन्, तुम पहले समाधि से बाह्य अर्थो की भावना का ओर उसके हेतु
धर्मअधर्म के जंगल का छेदन करो फिर उत्तम सूक्ष्मता ब्रह्मभाव) प्राप्त कर शोकरहित हो जाओ