Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 119, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
भरितभुवनाभोगो भूत्वा विभागबहिष्कृतो गलितकलनाभासोल्लासो विवेकविलासवान् ।
अधिगतपरानन्दस्पन्दश्चिराय निरामयः ।
शमसमसितस्वच्छाभोगो भवाभयचिद्वपुः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे पुत्र, सबसे पहले तुम सदसद्रस्तु के विवेक के विलास से युक्त होकर समाधि से समस्त बाह्य कल्पनाओं
से निर्मुक्त हो जाओ तथा समस्त इन विशाल भुवनो को अपने पूर्ण आत्मा के स्वरूप से ओत-प्रोत कर
दो। तदनन्तर असीम ब्रह्मरूप सुख के अभ्युदय को प्राप्त होकर उसके साथ एकरूप होते हुए संसाररूप
रोग से शून्य होकर पाँचवीं ओर छठी भूमिकाओं में दीर्घकालतक स्थिर रहो और अन्त में सातवीं
भूमिका में विक्षेपरूप विषमता की आत्यन्तिक शान्ति से जनित सम, शुभ्र ओर निर्मलाकार से युक्त हो
तुम निर्भय चैतन्यशरीर बन जाओ