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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verses 3–4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 119, verses 3–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

चन्द्रार्कवह्नितप्तायोरत्नादीनां यथार्चिषः । यथा पत्रादि वृक्षाणां निर्झराणां यथा कणाः ॥ ३ ॥ तथेदं ब्रह्मणि स्फारे जगद्बुद्ध्यादि कल्पितम् । दुःखप्रदमतज्ज्ञानां तदेवातदिव स्थितम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस ज्ञातात्मा की जीव, जगत्‌ दोनों मे साधारण एक सत्तारूप से संभावना की जा रही है, उसमें होनेवाली विशेष बाह्य, आध्यात्मिक पदार्थो की कल्पना में दृष्टान्त देते है । चन्द्र, सूर्य, अग्नि, तप्तलोह एवं रत्न आदि की प्रभा या ज्वाला; वृक्षो के पत्ते आदि तथा रनों के कण जैसे कल्पित हैं, वैसे ही बृहत्‌ इस ब्रह्म मे जगत्‌ की तथा जगत्‌-ग्राहक बुद्धि की विचित्रता भी कल्पित ही हे । वही ब्रह्म अब्रह्म -जैसा होकर अज्ञानियों के लिए दुःखप्रद होकर अवस्थित है