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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 119, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अहो नु चित्रा मायेयं तात विश्वविमोहिनी । सर्वाङ्गप्रोतमप्यात्मा यदात्मानं न पश्यति ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापक स्वयंप्रकाश आत्मा का दर्शन न होना तथा असद्रूप एवं प्रकाशशून्य जगत्‌ का दर्शन होना, यह एक बड़ा भारी आश्चर्य है और इस तरह का आश्चर्य एकमात्र अघटितघटनापटीयसी माया के बल से ही हुआ है, इसे कहते हैं। हे तात, अहो ! विश्व को मोह में डाल देनेवाली यह माया कैसी विचित्र है, जिसके बल से सम्पूर्ण अंगों में (बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थों में) भीतर और बाहर सब जगह व्याप्त भी आत्मा को यह जीव नहीं देख पाता