Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 119, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
चिदादर्शमयं सर्वं जगदित्येव भावयन् ।
यस्तिष्ठत्युपशान्तेच्छं स ब्रह्मकवचः सुखी ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब किस भावना से आत्मा को देखकर यह जीव सुखी होगा ? ऐसा प्रश्न होने पर उस भावना को
कहते हैं।
यह सारा संसार चिद्रूपी दर्पण है, (दर्पण में जैसे नगर आदि प्रातिभासिक हैं वैसे ही ब्रह्म में यह
जगत् प्रातिभासिक ही है वास्तविक नहीं है।)
इस तरह की भावना कर रहा जो प्राणी अपनी सारी इच्छाएँ नष्ट कर मोहरूपी हजारों बाणों से
कभी भी न छूटनेवाली ब्रह्मरूपी कवच पहिने हुए रहता है वही सुखी है