Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 119, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 119, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 119 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अहमर्थविमुक्तेन भावेनाभावरूपिणा ।
सर्वं शून्यं निरालम्बं चिद्रूपमिति भावयेत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
को पार कर जाने की इच्छा रखनेवाले प्रत्येक प्राणी को चाहिए कि वह) अहमर्थ से यानी अहंकार से
विमुक्त तथा निर्मलसात्तिक अन्तःकरण से सभी पदार्थ आकाश के सदृश निराधार चिद्रूप ब्रह्म ही हे"
ऐसी भावना करें