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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

तस्थुः परुषचित्तासु हृतवित्तोद्धतासु च । संरम्भक्षोभरौद्रीषु सर्वासु द्वन्द्वरीतिषु ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिनमें चित्त को क्लेश सहना पड़ता है, जो धन का अपहरण किये हुए शत्रुओं से पराभूत हैं तथा क्रोध, क्षोभ आदि से भयंकर हैं, ऐसी सभी शीतोष्णादि द्वन्द्वरीतियों में यानी विपत्तियों में वे महात्मा दृढ़तापूर्वक स्थित रहते थे