Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
नोदगुः कार्यसंपत्तावाक्रान्ता नास्तमाययुः ।
जहृषुर्न सुखप्राप्तौ मम्लुर्नैव च संकटे ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
वे शत्रुजय आदिरूप संपत्ति प्राप्त होनेपर न उत्कर्ष को प्राप्त
होते थे और न शत्रुओं से आक्रान्त होनेपर अपकर्ष को ही प्राप्त होते थे । वे सुख पाने पर न हर्षित
ही होते थे और न दुःख पाने पर खिन्न ही होते थे