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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 12, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 12, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 12 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

इत्यलक्ष्यचमत्कारा नारायणभुजा इव । ऋजवः स्खलिताकारा अपरा इव मेरवः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार वे जीवन्मुक्त महात्मा, नारायण की भुजाओं के सदृश, सूक्ष्मतम भी लक्ष्य का यानी ब्रह्मरूप लक्ष्य का वेधन करने में पटुतारूपी चमत्कृति रखते हैं और सरल एवं नग्र-स्वभाव होते हुए भी मेरुपर्वत के समान अटल होकर स्थित रहते हैं