Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
व्यवहार्युपशान्तो वा गृहस्थो वाथवैककः ।
अहं न किंचिच्चिदिति मत्वा जीवो न शोचति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यवहार करता हो, चाहे व्यवहार से विरत हो, गृहस्थ हो, चाहे अकेला
विचरण करनेवाला यति हो, परंतु पुरुष 'मैं असत् दृश्यरूप नहीं हूँ, किंतु विशुद्ध चैतन्यरूप हूँ ऐसा
निश्चय करने से सदा शोक से निर्मुक्त ही रहता है