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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

न म्रिये न च जीवामि नाहं सन्नाप्यसन्नयम् । आत्मारामो नरस्तिष्ठेत्तनमुक्तत्वमुदाहृतम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

सातवीं भूमिका में जीवन्मुक्त को कैसा अनुभव होता है, इसे कहते हैं। मैं न तो मरता हूँ न जीता हूँ, यह मैं न तो सत्‌ हूँ या न असत्‌ हूँ, ऐसे सुदृढ़ अनुभव से अपने स्वरूप में ही आराम करता हुआ वह पुरुष सप्तम भूमिका में स्थित रहता हे । यही उसका मुक्त स्वरूप कहा गया है