Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यद्भोगसुखदुःखांशैरपरामृष्टपूर्णधीः ।
सशरीरोऽशरीरो वा भवत्येवंमतिः पुमान् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
क्योकि
शरीर रहे चाहे शरीर न रहे, इस निश्चय से विषय ओर विषयसंग से जनित सुख दुःखों से जिसकी बुद्धि
आकृष्ट नहीं होती, वह जीवन्मुक्तमति पुरुष हे, यह अटल सिद्धान्त हे