Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
बद्धवासनमर्थो यः सेव्यते सुखयत्यसौ ।
यत्सुखाय तदेवाशु वस्तु दुःखाय नाशतः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
पर जैसे अज्ञानी को दुःख प्राप्त होता है वैसे ही ज्ञानी को भी दुःख प्राप्त होगा, ऐसी आशंका कर
कुछ विशेष कहने के लिए विषय का नाश होने पर ज्ञानी को दुःख की उत्पत्ति किस रीति से होती
है, उसे बतलाते हैं ।
दृढ़ आसक्ति लेकर अज्ञानी पुरुष जिस अर्थ का सेवन करता है वह उसे आपाततः सुख देता हे ।
जो ऐसा अर्थ आपाततः सुखजनक होता है वह तत्क्षण ही नाश से दुःखजनक भी हो जाता है । इस रीति
से यह बात सिद्ध हो गयी कि सुख और दुःख साथ-साथ ही चलते हे