Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 120, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 120, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 120 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
अविनाभावनिष्ठत्वं प्रसिद्धं सुखदुःखयोः ।
तनुवासनमर्थो यः सेव्यते वा विवासनम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
चतुर्थादि भूमिकाओं में
स्वल्प वासना से युक्त हो या सप्तम भूमिका में बिलकुल वासनारहित होकर जो पुरुष जिस अर्थ का
सेवन करता है वह अर्थ उस पुरुष के लिए न सुखजनक होता है ओर न नाशकाल में दुःखजनक ही
होता हे