Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 121, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
नाप्यशून्यं न शून्यं च नाचिद्रूपं न चिन्मयम् ।
नात्मरूपं नान्यरूपं भुवनं भावयन्भव ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
करनेवाले परमेश्वर की रूपता नहीं बन सकती । ओर यदि जगत् चैतन्य का रूप नहीं है, तो चैतन्य का
कभी ज्ञान ही नहीं हो सकेगा, क्योकि नीरूप का कहीं पर भी ज्ञान नहीं होता। यदि जगत् को चैतन्य का
रूप मान लिया जाय, तो चैतन्य सविकार हो जायेगा । यदि जगत् आत्मरूप न माना जाय, तो असंग
आत्मा के साथ उसका सम्बन्ध न हो सकने से आत्मा की सत्ता और स्फूर्ति जगत् में हो नहीं सकेगी ।
यदि आत्मरूप माने, तो जगत् का ज्ञान से बाध नहीं हो सकेगा, इत्यादि दोषों का - अनिर्वचनीयतावाद
का अवलम्बनकर परिहार करते है।
यह जगत् न तो अशून्यरूप है, न शून्यरूप है, न अचिद्रूप है, न चिद्रूप है, न आत्मरूप है ओर न
अनात्मरूप ही है, किंतु अनिर्वचनीय है, यों भावना करते हुए तुम स्थित रहो