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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verses 12–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 121, verses 12–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 12,13

संस्कृत श्लोक

एतत्स्वरूपमासाद्य प्रकृतिः परिशाम्यति । न देशो मोक्षनामास्ति न कालो नेतरा स्थितिः ॥ १२ ॥ अहंकृतेर्विमोहस्य क्षयेणेयं विलीयते । प्रकृतिर्भावनानाम्नी मोक्षः स्यादेष एव सः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

तब जगत्‌ किस तरह से शान्त हो जाता है, इस पर कहते हैं। इस आत्मा का पारमार्थिकस्वरूप प्राप्त कर यानी प्रत्यक्ष कर अविद्या शान्त हो जाती हे । कोई मोक्ष नामका न तो प्रदेश हे, मोक्ष नाम का न कोई काल है और न कोई स्थिति ही मोक्ष नामवाली हे । यह जो वासनारूपी प्रकृति (अविद्या) है, वह अहंकाररूपी मोह के विनाश से विलीन हो जाती है ओर यह अविद्या विलय ही प्रसिद्ध मोक्ष हे