Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 121, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 121, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 121 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
प्रशान्तशास्त्रार्थविचारचापलो निवृत्तनानारसकाव्यकौतुकः ।
निरस्तनिःशेषविकल्पविप्लवः समः सुखं तिष्ठति शाश्वतात्मकः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जब अविद्या का नाश हो जाता है, तब पुरुष की स्थिति कैसी रहती है, इस पर कहते है ।
जब योगी पुरुष की अविद्या नष्ट हो जाती है, तब उसकी नाना प्रकार के शास्त्रार्थो के विचार
की चंचलता नष्ट हो जाती है, काव्य, नाटक आदि विषयों की उत्कण्ठा नष्ट हो जाती हे ओर उसके
सारे विकल्पविभ्रम विलीन हो जाते हैँ । वह केवल समभाव में निष्ठा रखकर ब्रह्मरूप होकर सुखपूर्वक
अवस्थित रहता है