Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 122, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
तनुं त्यजतु वा तीर्थे श्वपचस्य गृहेऽपि वा ।
मा कदाचन वा राजन्वर्तमानेऽपि वा क्षणे ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञानकाल में ही मुक्ति तथा देहादि का बाध हो जाने से ज्ञानी को फिर मुक्ति के लिए किसी तीर्थ
आदि की या देह-त्याग की चिन्ता ही नहीं रहती, यह कहते है ।
हे राजन्, वह ज्ञानी पुरुष अपने शरीर का किसी पुण्य तीर्थ में त्याग कर दे या किसी चाण्डाल के
घर में भी जाकर त्याग कर दे अथवा कभी भी शरीर का त्याग न करे या वर्तमान क्षण में ही त्याग कर दे,
फिर भी वह अन्तःकरणशून्य पुरुष ज्ञानप्राप्तिकाल में पहले ही मुक्त ओर विदेह हो चुका है