Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, Verses 7–10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 122, verses 7–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 7-10
संस्कृत श्लोक
विहरञ्जनतावृन्दे देहकर्तनपूजनैः ।
खेदाह्लादौ न जानाति प्रतिबिम्बगतैरिव ॥ ७ ॥
निःस्तोत्रो निर्विकारश्च पूज्यपूजाविवर्जितः ।
संयुक्तश्च वियुक्तश्च सर्वाचारनयक्रमैः ॥ ८ ॥
तस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च सः ।
रागद्वेषभयानन्दैस्त्यज्यतेऽपि च युज्यते ॥ ९ ॥
प्रमेये कस्यचिदपि न रोहति महाशयः ।
प्रमेयीक्रियते चापि बालेनाप्यदुराशयः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उसीको स्पष्ट बतलाते हैं।
भिन्न-भिन्न जाति के जनसमूह के व्यूह में विहार कर रहा, भेद ओर अभिमान से रहित ब्रह्मज्ञानी,
प्रतिबिम्ब में किये गये छेदन पूजन की नाई, अपनी देह के छेदन ओर गन्धपुष्प आदि के द्वारा पूजन से
खेद ओर आह्लाद को नहीं जानता । तात्पर्य यह है कि ब्रह्मज्ञानी देह के छेदन से किसी तरह के खेद का
या गन्धादि के द्वारा पूजन से किसी तरह के आह्नाद का अनुभव नहीं करता, कारण कि वह छेदन और
पूजन दोनों को देह के प्रतिबिम्ब के समान मिथ्या समझता है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष पूजित होने पर भी पूजा
करनेवाले की स्तुति (प्रशंसा) नहीं करता तथा पूजा से रहित हुआ भी वह किसी तरह के विकार को
प्राप्त नहीं होता। वह सम्पूर्ण आचारो ओर सब नीतियों के क्रमों से कभी संयुक्त ओर कभी वियुक्त भी
रहता है । उस ब्रह्मज्ञानी पुरुष से संसार उद्विग्न नहीं होता - भय नहीं करता ओर न वही संसार से
उद्विग्न होता है । राग-द्वेष के कारण विषयों से उत्पन्न भय ओर आनन्द से वह कदाचित् प्रबल प्रारब्ध
रहने के कारण संयुक्त ओर वियुक्त भी रहता है । वह महान् आशयवाला ब्रह्मज्ञानी कुशलबुद्धि पुरुष
के भी प्रमितिविषय में स्वयं अन्तर्भूत नहीं होता अर्थात् बड़े-बड़े तीक्ष्ण बुद्धिवाले पुरुष भी तत्वतः उस
ब्रह्मज्ञानी की सीमा जान नहीं सकते । किंतु व्यवहारतः तो एक छोटा बच्चा भी उसे प्रमिति का विषय
बना डालता है यानी थोड़े से भी अनुवर्तन से उसको अपने वश में कर डालता हे । इसमें कारण यह है
कि शुद्ध चित्त होने के कारण वह ब्रह्मवेत्ता अत्यन्त सरल है