Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 122, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
न यज्ञतीर्थैर्न तपःप्रदानैरासाद्यते तत्परमं पवित्रम् ।
आसाद्यते क्षीणभवामयानां भक्त्या सतामात्मविदां यदङ्ग ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस जीवन्मुक्त ज्ञानी का पूजन ही परम पुरुषार्थ दिलानेवाले ज्ञान में हेतु भी है, यह कहते है ।
हे प्रिय पुत्र, जिनके सांसारिक रोग क्षीण हो गये हैं, ऐसे जीवन्मुक्त सज्जनो के पूजन से जो परम
पवित्र पद ज्ञान द्वारा प्राप्त किया जाता है वह न तो यज्ञो ओर तीर्थो से प्राप्त किया जाता है एवं न
तपस्याओं तथा दानो से ही प्राप्त किया जाता हे