Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 122, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 122, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 122 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमुक्त्वा स भगवान्मनुर्ब्रह्मगृहं ययौ ।
इक्ष्वाकुरपि तां दृष्टिमवष्टभ्य स्थिरोऽभवत् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यों कहकर मनु भगवान् मेरुशिखर के ऊपर चले
गये ओर इक्ष्वाकु भी उस दृष्टि का अवलम्बन कर स्थिर हो गये